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New Delhi: राम विलास पासवान… वो नेता जिसकी कमी ना सिर्फ बिहार में बल्कि हिंदुस्तान की राजनीति में हमेशा खलेगी. 5 दशक तक राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले राम विलास पासवान आखिरकार दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी यादें अब लोगों के दिलों और दिमाग में रहेगी.

लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिसने उन्हें कभी ना भुलाने वाला मेता बना दिया. ऐसी ही एक बात आज हम आपको बता रहे हैं. आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया था जो एक डोम जाति के घर उच्च जाति के लोगों को जाने पर मजबूर कर दिया था. चाहे वह ब्राम्हण हो या फिर भूमिहार. या फिर राजपूत..

कहानी उस डोम की.

एक बार की बात है राम विलास पासवान अपने काफिले के साथ कहीं जा रहे थे, तभी डोम समाज के व्यक्ति ने उनके काफिले को हाथ दिया. राम विलास की वजर पड़ी और उन्होंने अपनी रुकवाई. उस व्यक्ति ने उन्हें रोते हुए अपना दुखड़ा सुनाया. कहा- कोई मुझे कुएं से पानी भरने नहीं देता. हमारी जाति की वजह से कोई मुझे पास के गांव में जाने नहीं देता.

इसपर नेता रामविलास पासवान को गुस्सा आया. और उन्होंने तुरंत आदेश जारी कर दिया. उस व्यक्ति ने उम्मीद भी नहीं की होगी जो उसे मिल गई. आदेश का पालन हुआ. और रामविलास पासवान के आदेश के बाद उस व्यक्ति के घर में टेलीफोन लगवाया गया. चापाकल गढ़वा दिए गए. रामविलास पासवान ने कुछ ऐसा कर दिया जिसने सबको चौंका दिया. क्योंकि जिस व्यक्ति को लोग पानी तक भरने नहीं दे रहे थे, उसी के घर बड़े से बड़े. उच्च जाति के लोगों को भी जाना पड़ रहा था. क्योंकि उस गांव में उस व्यक्ति के घर लगा ये पहला टेलीफोन था.

अगर किसी को अपने दूर के रिश्तेदार से बात करनी होती थी तो उसी डोम के घर जाकर फोन करना पड़ता था. ये बात उन्होंने भागलपुर की एक सभा में कही थी जब वह दूरसंचार मंत्री बने थे. जो सेलफोन अंबानियों के हाथ का खिलौना था, उसे हमने मंगरू चाचा के हाथ में थमा दिया था. एक दिन हमने कहा था कि ये मोबाइल एक दिन भिंडी के भाव बिकेगा और आज वही हो रहा है.

राम विलास पासवान एक ऐसे नेता रहे जिन्होंने उन लोगों की आवाज सुनी, जिनका कोई सुनने वाला नहीं था. हमेशा परेशान लोगों की मदद करने को अपने छात्र जीवन से ही तत्पर रहते थे राम विलास पासवान. दलितों से नेता के रूप में पहचाने जाने वाले शानदार पॉलिटिशियन, शानदार इंसान, मुस्कुराता चेहरा, बड़े लीडर ..इनके रगो में राजनीति दौड़ती थी. 1970 से इनका पॉलिटिकल करियर की शुरुआत हुई. सरकार रहे या न रहे हम तो मिनिस्टर रहेंगे. तो चलिए आपको बताते हैं राम विलास पासवान की बायोग्राफी.

राम विलास पासवान आज हमारे बीच नहीं रहे. वह काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. इनके हार्ट में प्रॉब्लम थी, जिसके बाद उन्हें सर्जरी के लिए अस्पताल में एडमिट किया गया था. लेकिन अफसोस हमने एक महान और वरिष्ठ नेता खो दिया. गरीब और दलितों की बुलंद आवाज खो गई. पक्ष विपक्ष के सभी नेताओं ने ट्वीट कर श्रद्धांजलि दी. पीएम मोदी ने तो कहा कि- मैंने एक दोस्त अपना साथी खोया है. जो गरीबों के नेता जाने जाते थे.

राम विलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया में हुआ था. पिता का नाम- जामुन पासवान और माता का नाम सिया देवी. उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से बेचलर्स ऑफ लॉ, मास्टर्स ऑफ आर्ट्स भी किया. इसके बाद वह राजनीति में आए. बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि राम विलास पासवान सिविल सर्विसेस भी पास कर चुके हैं. इन्होंने जब लॉ की डिग्राी ली और एमए किया उसके बाद उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा दी.

आपको हैरानी होगी कि वह उस परीक्षा में न सिर्फ पास हुए थे, बल्कि उनका सिलेक्शन भी हो चुका था. उन्हें सिविल सेवा की परीक्षा पास करके DSP पद बनाया गया था. लेकिन उन्होंने उस पद को ठुकरा दिया था. बिहार में एक वक्त ऐसा चल रहा था जब नेता आए और गए. 1969 में राम विलास पासवान ने राजनीति ज्वाइन की. आपको बता दें कि इसके लोकसभा चुनाव में राम विलास पासवान 5 लाख वोटों से जीत हासिल की थी.

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